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व्यंग्य

व्यंग: बेपटरी अब रेल

Literature special satire on railway accidents increasing

बेपटरी अब रेल ।
लापरवाही चरम ।।

शक हो रहा रेलवे ।
ना निभाते धरम ।।

मुआवज़ा-निलंबन ।
सुनते केवल कान ।।

तरस गयीं आँखें ।
ना दिखे परिणाम ।।

कायाकल्प लगातार ।
गया नहीं भय ।।

जानमाल की रक्षा ।
आएगा समय ?

कृष्णेन्द्र राय

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Reporter : Krishnendra Rai

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