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व्यंग्य

व्यंग: नैतिकता लाचार!

Literature special satire on no moral in politics

टूट रहे विधायक ।
जुट रही सरकार ।।

जनसेवा हावी ।
नैतिकता लाचार ।।

राजनीतिक अखाड़ा ।
पटखनी पर ज़ोर ।।

हो जाना क़ाबिज़ ।
ना मचाओ शोर ।।

करनी है लीला ।
निहार रही जनता ।।

उठापटक विरासत ।
अभिनय करे समता ?

कृष्णेन्द्र राय

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Reporter : Krishnendra Rai

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