व्यंग्य

कविता: ना करना अतिक्रमण !

ना हमें आपत्ति ।
ले आओ आरक्षण ।।

राजधर्म निभाना ।
ना करना अतिक्रमण ।।

करो समाज सुधार ।
इतना रखना ख़याल ।।

अगर बिगड़ा संतुलन ।
उठना है सवाल ।।

इरादे रहें नेक ।
ना लगे चिंगारी ।।

समरसता पनपाओ ।
आरक्षण गर सवारी ।।

कृष्णेन्द्र राय

 

Reporter : Krishnendra Rai

Related posts

व्यंग: कुर्सी ली अँगड़ाई ?

Krishnendra Rai

व्यंग: समाजवाद विखराव!

Krishnendra Rai

व्यंग: बात में वज़न ?

Krishnendra Rai

Leave a Comment