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व्यंग्य

व्यंग: लूँगा अब नाम !

सियासी मजबूरी ।
लूँगा अब नाम ।।

खिसका जनाधार ।
बोलो जयश्रीराम ।।

बदली है रंगत ।
कायापलट जारी ।।

असमंजस स्थिति ।
करूँ मैं सवारी ?

गरम है मुद्दा ।
टपक रहा लार ।।

गर्त में हैं हम ।
कुंद पड़ी धार ।।

कृष्णेन्द्र राय

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Reporter : Krishnendra Rai

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