dark history of conservation homes, charged before
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लखनऊ: संरक्षण गृहों का काला इतिहास, पहले भी लगते रहे हैं गंभीर आरोप

Shambhavi

By: Shambhavi

Published on: Wed 08 Aug 2018 12:59 PM

Uttar Pradesh News Portal : लखनऊ: संरक्षण गृहों का काला इतिहास, पहले भी लगते रहे हैं गंभीर आरोप

राजधानी लखनऊ में कई ऐसे आश्रय गृह हैं, जिन पर कई गम्भीर आरोप लगते रहे हैं लेकिन कारवाई के नाम पर कुछ नहीं किया गया और न हीं प्रशासन ने इन आश्रय गृहों से कोई सबक लिया. इनमें मोतीनगर स्थित लीलावती बाल गृह, मोहान रोड स्थित राजकीय संप्रेक्षण गृह और प्राग नरायन रोड स्थित राजकीय बाल गृह का उदाहरण शामिल है.  जहाँ बच्चे बेचने, बच्चों को मादक पदार्थ देने तक के कई गम्भीर आरोप लग चुके हैं.

देवरिया के बाल संरक्षण गृह का मामला खुलने के बाद धीरे धीरे और अनाथालय, किशोर और बाल गृह की पुरानी परतें भी खुलने लगीं हैं.  बड़ी बात ये है कि अभी तक सब सही था पर जैसे ही एक मामला खुला, बाकि मामले भी बाहर आने लगे. देवरिया पहला नहीं है.

पहले भी बहुत से संरक्षण गृहों पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं, बस जांच के अभाव में गलत काम भी धड़ल्ले से चल रहा. इसे अधिकारियों और जांच कमिटी की लापरवाही कहेंगे कि सालों तक देवरिया और अन्य जिलों में ऐसे रैकेट चलते आ रहे हैं लेकिन फिर भी समय समय पर न तो इनकी जांच होती है और न ही नहीं कोई कार्रवाई. राजधानी के ही ऐसे कई संरक्षण गृह हैं जिसपर आरोप तो लगे पर जांच सही से नहीं हुई.

लीलावती मुंशी बालगृह-बच्चे बेचने का आरोप:

लखनऊ के मोती नगर स्थित इस निजी बाल गृह में 80 से 100 बच्चे रखे जाते हैं। इस बाल गृह में सरकारी नियमों के मुताबिक़ बच्चों को शिक्षित व रोजगार से जोड़ने का काम किया जाता है लेकिन ये वहीं बाल गृह है जहाँ दत्तक गृह के बच्चों को बेचने के भी आरोप लगे हैं. लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये.

राजकीय संप्रेक्षण गृह- बच्चों को मादक पदार्थ देने का आरोप:

मोहान रोड पर बने राजकीय संप्रेक्षण गृह में साथ 2017 में 8 किशोरों के भागने का मामला सामने आ चुका है. उस दौरान यहाँ 60 बच्चों की क्षमता के बावजूद चार जिलों के 130 बच्चों व किशोरों को रखा गया था. हब मामला संज्ञान में आया तो कार्रवाई के नाम पर केवल संप्रेक्षण गृह के अधीक्षक का तबादला कर दिया गया.

वहीं जिला प्रशासन ने साल 2017 नवंबर में जब संप्रेक्षण गृह की छापामारी की तो वहां रह रहे बच्चों ने बताया कि उन्हें संप्रेक्षण गृह का स्टाफ नशीली दवाएं मुहैया करवाता है। कम उम्र के बच्चों को मादक प्रदार्थ देने की शिकायत सहित उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि बड़ी उम्र के किशोर उनका यौन शोषण करते हैं.

बता दें कि इस आरोप के बाद भी कभी इस मामले में विस्तृत जांच नहीं करवाई गयी. राजकीय संप्रेक्षण गृह वह जगह है जहाँ जेजे एक्ट के तहत कानून के विरुद्ध गतिविधियों में लिप्त पाए किशोरों को रखा जाता है।

राजकीय बाल गृह (शिशु)- नवजात की हुई थी मौत: 

राजधानी के प्राग नारायण रोड पर बने राजकीय बाल शिशु गृह में 2016 दिसम्बर में चार बच्चे छत से कूद कर भागे थे। इनमें से दो रेलवे स्टेशन से बरामद हुए, लेकिन बाकियों का कोई सुराग नहीं मिला। बरामद बच्चों ने बताया कि उन्हें स्टाफ व अधीक्षक पीटते थे।

वहीं कार्रवाई के नाम पर जांच हुई और सजा के नाम पर बाल गृह के संविदा कर्मचारियों का दूसरे बाल गृह में स्थानांतरण कर दिया गया।इससे भी बड़ा आरोप बाल गृह पर लगा एक नवजात बच्चे की मौत का.

साल 2017 में यहां शरण में आये एक नवजात बच्चे के पैर में संक्रमण हुआ जिसकी बाद में झलकारी बाई अस्पताल में मौत हो गई। गौरतलब बात ये है कि नवजात का पैर स्टाफ की लापरवाही से प्रेस से जला था. इसके बावजूद  कर्मचारियों की सख्त जांच नहीं हुई और न दोषियों को सज़ा मिली.

राजकीय बाल गृह (किशोर)- बड़ी उम्र के किशोरों करते हैं बच्चों का शोषण:

मोहान रोड स्थित राजकीय बाल गृह में 12 से 18 वर्ष तक के किशोरों को रखा जाता है। लेकिन यहां कई 20 वर्ष की उम्र तक किशोर हैं। बाल गृह में बड़े उम्र के किशोर छोटी उम्र के किशोरों शोषण करते हैं, उनसे अपने काम करवाने और गुलामों जैसे व्यवहार करते हैं. जिसकी शिकायतें कई बार बच्चों ने बाल आयोग व डीपीओ के दौरों में की, पर कार्रवाई नहीं हुई।

यहां कई बाल श्रमिकों को रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद शरण दिलाई जाती है। उनसे मिलने आए अभिभावकों से स्टाफ के रिश्वत मांगने के आरोप लगते हैं।

श्रीराम औद्योगिक अनाथालय- मां से छीनकर बेचा गया बच्चा:

अलीगंज के इस अनाथालय में बच्चे को बेचने का मामला सामने आया था. निजी हाथों में रहे 100 से अधिक वर्ष पुराने इसे अनाथालय से 2013 में बच्चे को जयपुर के दंपती को गोद दिलवाया गया। उस समय अधीक्षिका रुचि त्रिपाठी थी। बाद में सामने आया कि उस बच्चे की मां निशा जीवित थी और उससे जबरन वह बच्चा लिया गया था।

बच्चे के लिए निशा हाईकोर्ट तक लड़ी, डीएनए टेस्ट करवाए गए, जिसमें साबित हुआ कि बच्चा उसी का ही है। लेकिन उस समय भी बच्चा निशा को वापस नहीं मिला, मुकदमे में दूसरा पक्ष आगे की तारीखें लेता चला गया।

एक्शन के नाम पर केवल अनाथालय में बाल कल्याण समिति ने लावारिस बच्चों को शरण दिलाना बंद कर दिया। प्रशासन ने मान्यता खत्म की और निजाम बदला गया। फिलहाल अभी अनाथालय में 35 बच्चे हैं, नए संचालकों के सुधार कार्यों के बाद वापस यहां लावारिस बच्चों को शरण दिलाई जाने लगी है।

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