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छतीसगढ़: कुँवारी लड़कियां अपना रही ऐसी प्रथा, देखकर उड़ जायेंगे होश

Praveen Singh

By: Praveen Singh

Published on: Mon 30 Oct 2017 03:51 PM

Uttar Pradesh News Portal : छतीसगढ़: कुँवारी लड़कियां अपना रही ऐसी प्रथा, देखकर उड़ जायेंगे होश

महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ जैसे अपराध जहां रुकने का नाम नहीं ले रहें हैं वहीँ दुनिया की हर महिला को सड़क पर चलते समय बुरी नजरों का सामना करना पड़ता है, लेकिन भारत कि एक ऐसी जगह का पता चला है जहां महिलाएं लोगों की बुरी नजर से बचने के लिए अपने शरीर के इन खास  हिस्सों पर अजीबों-गरीब (tradition) काम करवा रही हैं.

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जाने यहां की ये चौकाने वाली प्रथा (tradition):

  • दुनिया हर महिला को हर रोज राह चलते बुरी नजर का सामना करना पड़ता है.
  • लेकिन छत्तीसगढ़ के इन आदिवासियों ने इससे बचने के लिए काई सालों पहले एक प्रथा (tradition) को अपना लिया है.

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  • बता दें कि आज के दौर में टैटू (गोदना) बनवाना भले ही लोगों के लिए फैशन है.
  • लेकिन छत्तीसगढ़ रायपुर में  टैटू बनवाना इन आदिवासियों के लिए एक जरूरी प्रथा बन चुकी है.

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  • जी हां बैगा आदिवासी की सभी लड़कियां को 12 से 20 साल की उम्र में गोदना गुदवाना जरूरी ही होता है.

शरीर के इन हिस्सों पर गुद्ता है गोदना:

  • बता दें कि यहां लड़कियों को शरीर के कुछ खास हिस्सों में गोदना गोदवाना पड़ता है.

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  • जिसकी जैसी उम्र होती है उसी हिसाब से शरीर के अलग-अलग हिस्सों में गोदना गुदवाया जाता है.
  • सबसे पहले माथे से और उसके बाद पैर, जांघ और हाथ के अलावा चेहरे पर ये गोदना गोद्वाया जाता है.

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  • वहीँ सबसे आखिर में पीठ पर भी इसे गुदवाया जाता है.

कामुक राजा से बचने के लिए होता था ये काम:

  • बता दें कि सालों पहले से ही बैगा जनजातियों ने कुंवारी लड़कियों को बचाने के लिए इस प्रथा की शुरुवात की थी.

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  • सालों पहले यहां का एक राजा बेहद कामुक प्रवृत्ति का था.
  • अपनी इस प्रवृत्ति के कारण वह हर रोज एक नई लड़की को अपना शिकार बनाता था.
  • जिससे वहां के सभी निवासी उससे प्रताड़ित रहते थे.

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  • बता दें कि वह लड़की का उपभोग करने के बाद उसके शरीर पर गोदना गुदवा देता था.
  • लेकिन गाँव वालों ने इससे परेशान होकर इस प्रथा को अपनाने का फैसला लिया.
  • इसीलिए सभी लोगों ने अपनी कुंवारी लड़कियों को गोदना गुदवाना शुरू कर दिया ताकि राजा से उनको बचाया जा सके.
  • तभी से यहां की ये प्रथा आज तक चली आ रही है.

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Praveen Singh

journalist at uttarpradesh.org.