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व्यंग्य

व्यंग: बेपटरी अब रेल

Krishnendra Rai
बेपटरी अब रेल । लापरवाही चरम ।। शक हो रहा रेलवे । ना निभाते धरम ।। मुआवज़ा-निलंबन । सुनते केवल कान ।। तरस गयीं आँखें