जिन्ना बनाम गन्ना की सियासत में संघ बनाना चाहती है सुरेश राणा को BJP का ट्रम्प कार्ड

BJP uses suresh rana for jinnah vs sugercane politics

कैराना में हार के कारण कुछ और हैं, संघ और पार्टी फ़िलहाल यूपी में ऐतिहासिक गन्ने के उत्पादन को कराना चाहती है किसानो में कैश. योगी को निर्देश कि हर हाल में गन्ने का बकाया भुगतान तेज़ी से हो, ताकि साल के अंत में 2019 के संग्राम का शंखनाद  किया जा सके. 

योगी सरकार में गन्ना किसान पर राजनीति:

देश के कई राज्यों का जितना सालाना बजट नहीं है उससे कहीं ज्यादा बड़ी रकम यूपी के गन्ना किसानों के हाथों में सौंपी गयी. ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि  उप्र में योगी सरकार ने साल भर में 33 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की रकम गन्ना किसानों को चीनी मिलों से दिलाई है. यही नहीं आज़ादी के बाद यूपी में पहली बार 120 लाख टन का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है.

सच तो यह है कि  उप्र में टूटी सड़कों के गड्ढे भले ही न भर पाए हों या नए हाई-वे बनाने के प्रोजेक्ट फाइलों से बाहर न निकल पाए हों लेकिन गन्ने के क्षेत्र में योगी सरकार ने 70 साल बनाम 70 महीने के नारे को हकीकत में बदला है.

70  साल पहले तो उप्र में गन्ने और चीनी उत्पादन की स्थिति की बात क्या की जाए सिर्फ दो साल पहले अखिलेश सरकार के दौरान 62  लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था जिसे योगी सरकार ने बेहद काम समय में दुगना कर दिया है.

आज मौजूदा साल में 120 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है जिसे गन्ने के जानकार भूतो न भविष्यति की संज्ञा दे रहे हैं.

सुरेश राणा की भूमिका अहम: 

गन्ने के खेत से लेकर चीनी मिलों की काया पलट के होना तो यह चाहिए था कि चौ. चरण सिंह के किसी उत्तराधिकारी का हाथ होता लेकिन इस बदलाव के पीछे संघ से जुड़े भाजपा के मंत्री सुरेश राणा, योगी और मोदी के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं.

दरअसल राणा खुद पश्चिमी उप्र की गन्ना बेल्ट से आते हैं और अलीगढ़ से लेकर सहारनपुर के चौधरियों के बीच उनकी ज़बरदस्त पैठ बनाते हैं.

उत्तर प्रदेश में बसपा की अध्यक्ष मायावती और सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने चीनी मिलों से लेकर शुगर लॉबी तक के साथ कई ऐसे समझौते किये कि राज्य की कई सरकारी मिलें ही बंद हो गयी. मायावती ने तो अपने एक पसंदीदा उद्योगपति के हाथों सरकारों मिलें कौड़ियों के दाम बेच दीं.

सच तो ये है की कई बंद पड़ी चीनी मीलों को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में बदलने की साज़िश रची जा रही थी. लेकिन सुरेश राणा ने मंत्री बनते ही शुगर लॉबी की  जगह किसान हितों को आगे रखा.

राणा ने सबसे पहले शुगर लॉबी  पर बंद चीनी मिलें खोलने का दबाव बनाया. उन्होंने बुलंदशहर में वेव शुगर मिल को चालू करवाया जिससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानो को न सिर्फ राहत मिली बल्कि उनके खातों में भी पसीने का मोल दर्ज़ हुआ.

बंद सुगर मिल करवाई शुरू:

दिल्ली से सटे बुलंदशहर के बीचों बीच 350 बीघे के ज़मीं पर खड़ी वेव शुगर मिल कई साल से बंद पड़ी थी. मिल पर रियल एस्टेट माफिया की नज़र थी क्यूंकि वहां की ज़मीं का भाव 30 हजार रुपए गज़ तक पहुँच गया था.  मिल मालिक भी चाहते थे कि मिल को कंडम करके उसकी ज़मीन  बेच दी जाए.

लेकिन गन्ना मंत्री सुरेश राणा ने वेव के मालिकों से कहा की इस साल अगर मिल चालू नहीं हुई तो वे उसे सरकारी कब्ज़े में ले लेंगे. मंत्री के इस दबाव के बाद वेव के मालिक यानी चर्चित पोंटी चड्ढा ग्रुप को झुकना पड़ा और मिल शुरू की गयी.

यही नहीं वेव की तर्ज़ पर कई बंद पड़ी शुगर मिलें यूपी में शुरू हुई जिससे इस साल गन्ने का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है.

जानकारों का मानना है कि राणा ने न सिर्फ शुगर लॉबी और सत्ता के गठजोड़ को तोडा है बल्कि वे आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट किसानो के बीच भी तेज़ी से संवाद बना रहे हैं.

अजित सिंह भले ही जाट राजनीती में कैराना उप चुनाव जीतकर फिर से पैठ बनाने का ढिंढोरा पीट रहे हों लेकिन राणा कैराना के नतीजे को निर्णायक नहीं मानते हैं.

चुनावों में नतीजे फिर भी निर्णायक नहीं:

राणा के एक करीबी का कहना है कि बीजेपी की तरफ से दिवंगत हुकुम सिंह की बेटी ने अगर मज़बूत चुनाव लड़ा होता तो विपक्षी एक जुटता के बावजूद कैराना में कमल खिलता. बहरहाल यूपी के इतिहास में सबसे ज्यादा गन्ना उत्पादन का कीर्तिमान स्थापित करने वाले राणा को लेकर संघ उन्हें जाट वोटबैंक का नया ट्रम्प कार्ड बता रहा है.

संघके शीर्ष अधिकारीयों ने हाल ही में दिल्ली में हुई एक बैठक में मुख्यमंत्री योगी से कहा है  कि रिकॉर्ड उत्पादन के बाद वे गन्ने  का रिकॉर्ड  भुगतान भी जल्दी कराएं ताकि अक्टूबर आते आते प्रदेश में ‘जिन्ना’ राजनीती का जवाब  ‘गन्ना’ से दिया जा सके.

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