मानवाधिकार के रक्षक सुकमा नक्सली हमले पर क्यों हैं मौन?

 April 25, 2017 2:35 pm
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छत्तीसगढ़ में सोमवार की दोपहर में हुए नक्सली हमले में 25 CRPF जवान शहीद हो गए थे, जिसके बाद एक बार फिर से नक्सलियों ने केंद्र में बैठी सरकार की निष्क्रियता को साबित कर दिया है। साथ ही नक्सलियों ने यह भी साबित कर दिया है कि, इस देश की खातिर शहीद होने वाले जवानों की शहादत का कोई मोल नहीं है, 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता से सेना के जवानों की शहादतों को व्यर्थ न होने का वादा किया था, जो कहीं न कहीं आज भी एक वादा ही बना हुआ है, जिसे पूरा करने में सरकार नाकाम रही है। वहीँ देश और सरहदों की सुरक्षा में आये दिन हम अपने सैनिक भाइयों को खो रहे हैं।

उरी के बाद हुए हमलों में शहीद हुए सैनिकों का आंकड़ा (एक नजर):

16 अक्टूबर: 6 राजपूत रेजीमेंट का एक जवान राजौरी में सीमा पार से सीज फायर के उल्लंघन में शहीद।

22 अक्टूबर: कठुआ में क्रॉस बॉर्डर फायरिंग के दौरान घायल हुए BSF का एक जवान शहीद।

24 अक्टूबर: आरएस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान की ओर से मोर्टार फायरिंग में BSF का एक जवान शहीद।

27 अक्टूबर: आरएस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान की ओर से मोर्टार फायरिंग में BSF का एक और जवान शहीद।

28 अक्टूबर: तंगधार में LOC पर आतंकियों से मुठभेड़ के में एक सेना का एक जवान शहीद, कश्मीर के माछिल सेक्टर में सीज फायर के उल्लंघन के दौरान एक जवान शहीद, माछिल सेक्टर में एक पर जवान शहीद जिसके शव को क्षत-विक्षत किया गया था।

31 अक्टूबर: पाकिस्तान की ओर से मोर्टार फायरिंग के दौरान मेंधार सेक्टर में एक जवान शहीद, इस हमले में एक स्थानीय महिला की भी मौत हो गयी थी।

6 नवम्बर: पाकिस्तान द्वारा 6 जगहों पर मोर्टार से फायरिंग के दौरान दो सेना के जवान शहीद।

8 नवम्बर: नौशेरा में पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी में एक जवान शहीद।

9 नवम्बर: माछिल सेक्टर में पाकिस्तानी स्नाइपर के हमले में एक सेना का जवान शहीद, नौशेरा में हुए सीज फायर के उल्लंघन में घायल हुआ एक जवान भी शहीद।

21 नवम्बर: पकिस्तान की ओर से मोर्टार हमले के दौरान एक जवान शहीद, कई जवान हुए घायल हुए थे।

22 नवम्बर: माछिल सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान 3 सेना के जवान शहीद, जिसमें से एक सैनिक के शव को क्षत-विक्षत किया गया था।

13 फरवरी: दक्षिणी कश्मीर के कुलग्राम जिले में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान सेना के 2 जवान शहीद।

23 फरवरी: जम्मू-कश्मीर के सोपियां सेक्टर में सेना के गश्ती दल पर हमला जिसमें तीन जवान शहीद हुए थे।

(नोट: एक आंकड़े के मुताबिक, 2001 से अब तक पाकिस्तान की ओर से हुए सीज फायर उल्लंघन में करीब 4500 सैनिकों की जान जा चुकी है)

कहीं पत्थरबाज कहीं नक्सली:

सुकमा में हुए नक्सली हमले में देश ने अपने 25 वीर सपूतों को खो दिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के जवानों की शहादत को बेकार न जाने देने का वादा किया था, लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना वादा पूरा किया? जिसका जवाब शीशे की तरह साफ़ है, नहीं। पीएम मोदी का वह वादा आज भी जैसे का तैसा उनकी बातों में मौजूद है।

वहीँ देश और देशवासियों की सुरक्षा में लगे सेना के जवानों को हर जगह वो सब झेलना पड़ता है, जो शायद ही किसी और देश की सेना को झेलना पड़ता हो। फिर ऐसे में बात चाहे कश्मीर में हो रही पत्थरबाजी की हो या एक प्रकार से हर महीने होने वाले नक्सली हमले की, हमारे सैनिक हमारे लिए लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं और राजनीति के सूरमा उन शहादतों पर दो भावुकता भरे शब्दों को कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सेना की बहादुरी को ठेंगा दिखाते अराजक तत्व:

देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने हर बार की तरह इस बार भी हमले की कड़ी निंदा की लेकिन गृह मंत्री और जनता के प्रतिनिधि होने के तहत उन्हें यह समझना चाहिए कि, जनता ने उन्हें कड़ी निंदा नहीं त्वरित कार्रवाई करने के लिए चुना है, वरना कड़ी निंदा तो पहले की सरकारें भी करती रही हैं।

आप कब तक अपने जवानों की शहादत के खून को कड़ी निंदा के आंसुओं से धोयेंगे? केंद्र सरकार अभी भी उन पत्थरबाजों और नक्सलियों को मुख्य धारा से जोड़ने की बात कर रही है, आखिर क्यों? क्या देश की सरकार की नजरों में सेना के जवानों की शहादत सिर्फ राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति का जरिया मात्र हैं।

शायद राजनीतिक स्वार्थ ही वह वजह है जिसके कारण विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सेना को कुछ मुट्ठीभर अराजक लोग निशाना बनाकर गायब हो जाते हैं।

कुछ लोग नाखुश न हों उसके लिए सैनिकों की शहादत क्यों?:

ऐसा नहीं है कि, केंद्र सरकार द्वारा पत्थरबाजों और नक्सलियों को रोकने की कोशिश नहीं की गयी, लेकिन जब भी सरकार की ओर से कोई दमनकारी नीति लागू की जाती है तो देश के भीतर ही मौजूद आतंकियों और नक्सलियों के हमदर्द लोग सरकार को पत्थरबाजों-नक्सलियों के मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं, आज जो लोग नक्सली हमले के बाद इसे सरकार की असफल नीति बना रहे हैं, वहीँ लोग सरकार के खिलाफ प्रोटेस्ट करते हैं, जब सरकार पैलेट गन जैसा कदम उठाती है, मीडिया में भी इसपर डिबेट होती है ओर कहीं ना कहीं पत्थरबाजों को मजबूर और लाचार बताया जाता है।

लेकिन अब सवाल यह है कि, क्यों चंद लोगों को खुश करने के लिए सरकार द्वारा उन दमनकारी नीतियों को लागू नही किया जाता जिससे इस समस्या को सुलझाया जा सकता है। आप बातचीत से मसला हल करना चाहते हैं करिए, लेकिन आप उनसे मुंह की बोली में कैसे बात करेंगे, जब उन्हें सिर्फ गोली की भाषा ही समझ आती है।

अब कहाँ है देश की सर्वोच्च अदालत?:

इस देश में सबसे ऊपर बैठी न्यायपालिका भी ऐसे हमले होने के लिए किसी भी प्रकार से कम दोषी नहीं है, देश की सर्वोच्च अदालत कश्मीर में पैलेट गन के इस्तेमाल को रोक देती है, कारण, क्योंकि इससे उन लोगों को काफी तकलीफ होती है जो देश की रक्षा में मौजूद सैनिकों पर पत्थर फेंकते हैं।

क्या इसलिए भारतीय संविधान में न्यायपालिका को सबसे ऊपर रखा गया है, ताकि वो देश के जवानों के हाथों को अपने कानून से बांधकर उन्हें पत्थरबाजों और नक्सलियों के सामने डाले दें?

अगर हाँ, तो देश में सबसे पहले न्यायपालिका की व्यवस्था को बदल देना चाहिए, उस कानून को बदल देना चाहिए जिसके चलते आधी रात में सिर्फ इसलिए कोर्ट खुल जाता है क्योंकि इसी देश के कुछ लोग एक आतंकी की फांसी पर स्टे लेने पहुंचते हैं, यदि न्यायपालिका वास्तव में अपना काम करती तो उन लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होता, जो देश के सैनिकों को सिर्फ उन भटके हुए और सताए हुए लोगों के मनोरंजन का साधन मात्र मानते हैं।

देश होगा लेकिन सुरक्षा में एक सैनिक नहीं होगा:

देश में मौजूदा समय में जो हालात हैं, उनमें सही गलत का फर्क सिर्फ इस बात पर खत्म हो जाता है कि, पत्थर फेंकने वाला या नक्सली एक गरीब और सताया हुआ है।

उन सभी लोगों के लिए एक सवाल यह है कि, ये गरीब, सताए और भटके हुए लोग जिन जवानों पर पत्थर फेंक रहे हैं, उन्हें मार रहे हैं क्या सेना का वो जवान गरीब नहीं है? क्या गरीब होने के प्रमाण पत्र से आपको देश की एकता और अखंडता को खंडित करने का अधिकार मिल जाता है? देश में गरीबी और मजबूरी की आड़ में नक्सलवाद और पत्थरबाजों को शह देने की होड़ सी मची हुई है, यदि ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब देश का हर गरीब हाथों में बन्दूक लेकर मजबूरी नहीं मजबूती से उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा होगा जो आज उन्हें शह दे रहे हैं, बस तब फर्क इतना होगा कि, तब वो अपने बचाव के लिए सेना की ओर नहीं देख पाएंगे, ये देश तो होगा लेकिन देश की रक्षा में हँसते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाला एक भी सैनिक नहीं होगा।

Divyang Dixit

About Divyang Dixit

Journalist, Listener, Mother nature's son, progressive rock lover, Pedestrian, Proud Vegan, व्यंग्यकार
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