विशेष: उस दिन या तो पत्थरबाज जीप पर बंधा होता, या मेजर गोगोई का 'जमीर'

विशेष: उस दिन या तो पत्थरबाज जीप पर बंधा होता, या मेजर गोगोई का

जरा AC और टीवी कुछ देर के लिए बंद कर दीजिये, मोबाइल का डाटा ऑफ कर दीजिये, आँखें बंद हों और मेरे साथ एक दृश्य देखिये। बडगाम जिले का उटलीगाम मतदान केंद्र, शान्तिपूर्ण माहौल को भंग करते हुए और सन्नाटे को चीरते हुए अचानक 1200 लोग हाथ में पत्थर लिए वहां पहुँचते हैं, कुछ ITBP के जवान वहां सुरक्षा में तैनात थे वो फ़ौरन सेना से संपर्क कर मदद मांगते हैं।उस ITBP के जवान की मनोदशा का अंदाजा लगा सकते हैं? या मेजर गोगोई का, जो अभी मदद के लिए निकल भी नहीं पाए थे और सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, ना सिर्फ जवानों कि बल्कि वहां मौजूद तमाम सिविलियन्स की भी। पहुँचते ही मेजर गोगोई ने सरसरी निगाहों से पूरे केंद्र का मुआयना किया, उनके साथ 5 और थल सैनिक थे, एक्शन क्या लेना है अब ये फैसला उनको लेना था, कोई राजनीतिक दल, नेता, मीडिया या तथाकथित बुद्धीजीवियों को फ़ोन करने का वक़्त नहीं होता ऐसे मौकों पर।आर्मी चीफ़ विपिन रावत का बयान जरूर याद होगा "पत्थरबाजों को देशद्रोही की संज्ञा दी जाएगी", अगर आपने अब तक पढ़ना बंद नहीं किया है तो उटलीगाम मतदान केंद्र पर ही रहिये, मेजर गोगोई, थल सेना के पांच जवान बनाम 1200 पत्थरबाज, गोली चलाते तो कम से कम एक दर्ज़न जानें जाती, 1200 लोगों को निहत्थे संभालना असंभव था, वहां सिर्फ पत्थरबाज ही नहीं अन्य लोग भी थे जिसमें महिलाओं और बच्चों की संख्या भी कम नहीं थी।एक दीपक अंधकार ख़त्म कर देता है, एक छोटे से अंकुश से विशाल हाथी को वश में किया जा सकता है. इसी सोच के साथ उस दिन मेजर गोगोई ने अपने साथियों,जनता की सुरक्षा में और देश हित में कुछ ऐसा किया जो इतिहास बन गया, बिना किसी को घायल किये, विशाल एवं क्रोध से भरपूर भीड़ को नियंत्रित कर पाना इतिहास ही है।व्यक्ति का चुनाव भी कैसे किया गया इस पर चर्चा कम हुई, जीप पर बाँधा गया व्यक्ति कोई संत नहीं था, वो लोगों को उकसा रहा था, भ्रमित कर रहा था लेकिन किसके खिलाफ? अपनी ही देश की सेना के खिलाफ़। सच ही है, दूध और घी से सींचने पर नीम कभी मीठा नहीं हो सकता और संस्कृत भाषा में ऐसी परिस्थिति के लिए बेहद कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कही गयी है "शठे शाठ्यम समाचरेत"बिना समय गवाए मेजर लीतुल गोगोई को थलसेना अध्यक्ष द्वारा मिले सम्मान का मैं तहे दिल से स्वागत करता हूँ। सीमा पर स्थिति अक्सर बिगड़ जाती है, और जब तक सीमांकन नहीं होगा तब तक ऐसा होता रहेगा, सतर्कता बनाए रखनी होगी। लेकिन एक नागरिक की क्या जिम्मेदारी है? सेना का मनोबल बढ़ाना या उससे उसकी वीरता का सुबूत माँगना? तस्वीर में जीप पर बंधा वो व्यक्ति तो सबको दिख गया, लोग जो नहीं देख पाए तो वो कि, सभी नागरिक और जवान मेजर गोगोई के जीप के पीछे सुरक्षित खड़े थे।उस दिन अगर मेजर गोगोई ऐसा नहीं करते तो जवान फिर घायल होते, अपने लोगों की सुरक्षा में और अपने लोगों के खिलाफ लड़ते हुए। अर्जुन जैसे योद्धा को भी समझाने के लिए श्री कृष्ण स्वयं सारथी बन मौजूद थे, पर इस धर्म युद्ध में मेजर गोगोई अकेले थे। अगर उस दिन जीप पर पत्थरबाज नहीं बंधा होता तो शायद अपने घायल जवानों को देख मेजर गोगोई का 'जमीर' बंधा होता, और वो किसी कैमरे में कैद नहीं हो पाता।

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